आइए समझें: बैक्टीरिया आधारित जैव उर्वरक और माइकोराइजा क्यों हैं आवश्यक

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Importance of Biofertilizers and Mycorrhiza in India

आइए समझें: बैक्टीरिया आधारित जैव उर्वरक और माइकोराइजा क्यों हैं आवश्यक

आज की खेती में सबसे बड़ी चुनौती है – बढ़ती लागत, घटती मिट्टी की उर्वरता और मौसम का अनिश्चित व्यवहार। ऐसे समय में जैव उर्वरक (Biofertilizers) किसानों के लिए एक सस्ता, सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प बनकर सामने आए हैं।

मुख्य रूप से दो प्रकार के जैव उर्वरक खेतों में उपयोग किए जाते हैं – बैक्टीरिया आधारित जैव उर्वरक (जैसे PSB, KMB, ZSB) और माईकोराइजा। ये दोनों ही मिट्टी और पौधे के लिए बहुत फायदेमंद हैं, लेकिन इनका काम करने का तरीका अलग अलग होता है।

बैक्टीरिया आधारित जैव उर्वरक ऐसे सूक्ष्म जीव होते हैं जो मिट्टी में पहले से मौजूद पोषक तत्वों को पौधे के लिए उपलब्ध बनाते हैं। अक्सर मिट्टी में फास्फोरस, पोटाश और जिंक जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में होते हैं, लेकिन वे पौधे द्वारा सीधे उपयोग करने योग्य रूप में नहीं होते। यहीं पर PSB (फास्फेट घुलनशील बैक्टीरिया), KMB (पोटाश मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया) और ZSB (जिंक घुलनशील बैक्टीरिया) काम करते हैं। ये बैक्टीरिया अपने द्वारा बनाए गए प्राकृतिक अम्ल (organic acids) से इन पोषक तत्वों को घोल देते हैं, जिससे पौधे उन्हें आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। इसका सीधा लाभ यह होता है कि रासायनिक खाद की जरूरत कम हो जाती है और किसान की लागत घटती है।

दूसरी तरफ माइकोराइजा एक प्रकार का लाभकारी फंगस (कवक) है, जो पौधे की जड़ों के साथ मिलकर काम करता है। यह जड़ों के आसपास एक बारीक जाल बनाता है, जिसे हम हाइफी (hyphae) कहते हैं। यह जाल मिट्टी के अंदर दूर दूर तक फैलकर पानी और पोषक तत्वों को खींचता है और पौधे तक पहुंचाता है। इस प्रक्रिया में जड़ों का क्षेत्र कई गुना बढ़ जाता है, जिससे पौधे की पोषक तत्व लेने की क्षमता भी बढ़ जाती है। इसके अलावा यह पौधे को सूखे और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने में मदद करता है।

अगर आसान भाषा में समझें तो बैक्टीरिया उर्वरक मिट्टी में छिपे पोषक तत्वों को “घोलकर” उपलब्ध कराते हैं, जबकि माईकोराइजा पौधे की जड़ों को इतना मजबूत और फैला हुआ बना देता है कि वह ज्यादा से ज्यादा पोषण और पानी खींच सके। दोनों का काम अलग है, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही है – पौधे की अच्छी वृद्धि और अधिक उत्पादन।

अब अगर किसान के नजरिए से समझें तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल है – क्या इन दोनों का एक साथ उपयोग करना चाहिए? इसका उत्तर है , हाँ और यही सबसे अच्छा तरीका है। जब हम बैक्टीरिया आधारित जैव उर्वरक और माइकोराइजा दोनों का एक साथ उपयोग करते हैं, तो खेत में एक प्रकार का “डबल फायदा” मिलता है। बैक्टीरिया मिट्टी से पोषक तत्वों को उपलब्ध कराते हैं और माइकोराइजा उन पोषक तत्वों को ज्यादा मात्रा में पौधे तक पहुंचाने में मदद करता है। इससे फसल की वृद्धि तेज होती है, पौधे मजबूत बनते हैं और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि बैक्टीरिया आधारित जैव उर्वरक और माइकोराइजा दोनों ही आधुनिक खेती के लिए बहुत जरूरी हैं। यदि किसान केवल बैक्टीरिया का उपयोग करता है तो उसे पोषक तत्वों की उपलब्धता का लाभ मिलेगा, और यदि केवल माईकोराइजा का उपयोग करता है तो जड़ों का विकास बेहतर होगा। लेकिन अगर दोनों का संतुलित और सही उपयोग किया जाए, तो किसान को अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और कम लागत का पूरा लाभ मिल सकता है।

इसलिए समझदारी इसी में है कि किसान जैव उर्वरकों को अपनी खेती का नियमित हिस्सा बनाएं और माइकोराइजा के साथ उनका संयुक्त उपयोग करें। यही टिकाऊ खेती (Sustainable Farming) की दिशा में सबसे मजबूत कदम है।

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Author: Vishal UpadhyaySenior Regional Agronomist at Mosaic India, (M.B.A. in Agribusiness, M.Sc. in Agriculture).

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