आलू की फसल में कैल्शियम की भूमिका
भारत में आलू एक प्रमुख नकदी फसल है, जो न केवल किसानों की आमदनी का साधन है बल्कि देश के खाद्य सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। उच्च उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता वाले कंद (tubers) प्राप्त करने के लिए पोषण प्रबंधन बेहद ज़रूरी है। इन्हीं पोषक तत्वों में से कैल्शियम (Ca) आलू की फसल में एक अहम भूमिका निभाता है।

आलू में कैल्शियम की आवश्यकता
कैल्शियम पौधे की कोशिका भित्ति (cell wall) को मजबूत बनाता है और कोशिकाओं के विभाजन व विकास के लिए आवश्यक है। आलू की जड़ों और कंदों के अच्छे विकास के लिए मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम का होना ज़रूरी है।
कैल्शियम की मुख्य भूमिकाएँ
• कंद का विकास: कैल्शियम कंदों की त्वचा (periderm) को मजबूत बनाता है, जिससे आलू का भंडारण जीवन (shelf life) बढ़ता है।
• गुणवत्ता में सुधार: यह आलू को दरार, खुरदरापन और काली धब्बों (black spot) जैसी समस्याओं से बचाता है।
• रोग प्रतिरोधक क्षमता: पर्याप्त कैल्शियम पौधे को जीवाणु और फफूंदजनित रोगों के प्रति अधिक सहनशील बनाता है।
• जड़ प्रणाली का विकास: कैल्शियम की पर्याप्त उपलब्धता से मजबूत जड़ें विकसित होती हैं, जिससे पौधा पोषक तत्वों और नमी का बेहतर अवशोषण करता है।
• एन्ज़ाइम गतिविधि और संतुलन: कैल्शियम पौधे के अंदर कई एन्ज़ाइम गतिविधियों और पोषण संतुलन को नियंत्रित करता है।
कैल्शियम की कमी के लक्षण
• आलू के कंदों में दरारें और खोखलापन (hollow heart) दिखाई देना।
• पत्तियों के किनारों का पीला पड़ना और झुलसना।
• पौधों की धीमी वृद्धि और कमजोर जड़ें।
• आलू का भंडारण समय घट जाना और खराबी बढ़ जाना।
कैल्शियम की पूर्ति के उपाय
• कैल्शियम नाइट्रेट या जिप्सम (CaSO₄) का प्रयोग मिट्टी में करना।
• पत्तियों पर छिड़काव (foliar spray) द्वारा कैल्शियम की आपूर्ति।
• मिट्टी की जांच के आधार पर संतुलित और समय पर कैल्शियम का प्रयोग करना।
कैल्शियम को अक्सर एक गौण पोषक तत्व मान लिया जाता है, लेकिन वास्तव में यह आलू की उपज और गुणवत्ता दोनों के लिए अत्यंत आवश्यक है। संतुलित कैल्शियम प्रबंधन से न केवल किसान को बेहतर उत्पादन मिलेगा बल्कि आलू का भंडारण और बाजार मूल्य भी बढ़ेगा।
